गुरदासपुर एनकाउंटर पर सवाल : हाईकोर्ट की पंजाब पुलिस को फटकार; कहा- रणजीत 19 साल का बच्चा था, एनकाउंटर में हाईकोर्ट ने 2 हफ्ते में DGP गौरव यादव से जवाब तलब

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चंडीगढ़– गुरदासपुर में ASI-होमगार्ड जवान के मर्डर के आरोपी युवक रणजीत सिंह के एनकाउंटर में हाईकोर्ट ने 2 हफ्ते में DGP गौरव यादव से जवाब तलब किया है। एनकाउंटर को लेकर उठ रहे सवालों की वजह से पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने इसका संज्ञान लेने के बाद गुरूवार को सुनवाई की।

जिसमें DGP गौरव यादव वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सिस्टम पर सवाल उठाते हुए कहा कि हम आंखें बंद करके नहीं बैठ सकते। हालांकि इस दौरान पुलिस ने कहा कि हथियार की रिकवरी के वक्त उसके साथ 3-4 मुलाजिम गए थे।

इस पर कोर्ट ने पुलिस की कहानी पर सवाल उठाए कि हर एनकाउंटर की स्टोरी एक जैसी क्यों है। इस पर एडवोकेट तनु बेदी ने कहा कि नवंबर 2025 से जनवरी 2026 तक 34 एनकाउंटर हुए, सबकी कहानी एक जैसी ही है।

सुनवाई के दौरान DGP ने कहा कि इस मामले में SIT बना दी गई है। वह सारे मामले की जांच कर रही है। यह मामला CJM गुरदासपुर के ध्यान में भी है। इस पर अदालत ने कहा कि हमें पूरे मामले की डिटेल रिपोर्ट चाहिए। जिसके बाद कोर्ट ने पुलिस को जवाब दाखिल करने के लिए 2 हफ्ते का टाइम दिया।

कोर्ट ने कहा कि मृतक रणजीत सिंह 18-19 साल का बच्चा था। ऐसे में यह मामला काफी गंभीर है। हम इस मामले में आंखे बंद नहीं कर सकते है। इसलिए हमारी तरफ सू मोटो लिया गया है।अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोपियों को सजा देना कोर्ट का काम होता है। पुलिस खुद कोर्ट न बने। अब मामले की अगली सुनवाई 17 मार्च को होगी।

वहीं मृतक युवक रणजीत सिंह की मां सुखजिंदर कौर भी हाईकोर्ट पहुंच गई हैं। उन्होंने एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए रिटायर जज या CBI से पूरे मामले की जांच की मांग की है। इस पर कल सुनवाई होगी।

ASI और होमगार्ड की लाश इस हालत में मिलीं थीं।
ASI और होमगार्ड की लाश इस हालत में मिलीं थीं।

बता दें कि रणजीत के परिवार का कहना है कि पुलिस वाले उसे घर से उठाकर ले गए और फिर थाने में टॉर्चर से उसकी मौत हो गई। इसके बाद इसे एनकाउंटर बनाने के लिए सारी कहानी रची गई। उनका कहना है कि उसके पाकिस्तानी लिंक बताए गए लेकिन उसे सिर्फ एक ही पुलिस की गाड़ी लेकर क्यों गई?। फिर वहां से फरार होने पर आधी रात को उसके पास बाइक कहां से आई।

उसके पास तो कोई मोबाइल भी नहीं था कि वह किसी को कॉल कर अपनी मदद के लिए बुला सके। इस मामले में परिजन पहले पोस्टमॉर्टम न कराने पर अड़े रहे। मगर, कोर्ट के आदेश पर डॉक्टरों के बोर्ड के जरिए 7 दिन बाद पोस्टमॉर्टम कराया गया। हालांकि परिजन अब अंतिम संस्कार न करने पर अड़ गए हैं।

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