जालंधर में रोडवेज कर्मचारियों का अल्टीमेटम : 15 मई की बैठक फेल हुई तो होगा चक्का जाम

जालंधर पंजाब में सरकारी बसों के परिचालन को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। राज्यभर के 27 डिपो के पीआरटीसी और पनबस कर्मचारियों ने सरकार की ‘किलोमीटर स्कीम’ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कर्मचारियों ने साफ चेतावनी दी है कि अगर 15 मई को प्रशासन के साथ होने वाली बैठक में कोई सकारात्मक समाधान नहीं निकला, तो चरणबद्ध तरीके से विरोध प्रदर्शन किया जाएगा। इसके तहत 18 मई को एक दिन की सांकेतिक हड़ताल और फिर 25, 26 व 27 मई को पूरे पंजाब में बसों का ‘चक्का जाम’ करने का ऐलान किया गया है। जालंधर में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद कर्मचारी नेताओं ने अपनी रणनीति साझा की।

यूनियन का कहना है कि वे बस मीटिंग का इंतजार कर रहे हैं। यदि सरकार उनकी मांगों को अनसुना करती है, तो 17 मई को ही सभी बसें डिपो में खड़ी कर दी जाएंगी। इसके बाद अगले दिन यानी 18 मई को राज्यव्यापी हड़ताल होगी।

किलोमीटर स्कीम किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं

जालंधर-1 के डिपो प्रधान बिक्रमजीत सिंह ने कड़े शब्दों में कहा कि किलोमीटर स्कीम किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि यह स्कीम जबरन लागू की गई, तो विभाग के कर्मचारी उन बसों के लिए कंडक्टर मुहैया नहीं कराएंगे और न ही उन्हें सड़क पर चलने देंगे। कर्मचारियों का मानना है कि इस स्कीम के तहत बस और ड्राइवर दोनों निजी होंगे, जिससे भविष्य में सरकारी ड्राइवरों के पद पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे।

निजी मालिकों को फायदा पहुंचाने का आरोप

कर्मचारियों का मुख्य विरोध स्कीम की वित्तीय शर्तों को लेकर है। आरोप है कि इस योजना के तहत सरकार प्राइवेट बस मालिकों को 28 से 30 रुपए प्रति किलोमीटर के हिसाब से फिक्स भुगतान करेगी। इसका मतलब यह है कि अगर बस 100 किलोमीटर चलती है, तो मालिक को 3000 रुपए मिलना तय है। चाहे बस की सवारियों से होने वाली कमाई 1000 रुपए ही क्यों न हो। यह सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाकर निजी हाथों को लाभ देने की साजिश है।

पंजाब रोडवेज की बसें।
पंजाब रोडवेज की बसें।

जनता को होगी भारी परेशानी

यूनियन ने स्वीकार किया है कि इस विरोध प्रदर्शन से आम जनता को आवाजाही में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि वे लोगों को परेशान नहीं करना चाहते, लेकिन अपने हक और रोजगार को बचाने के लिए उनके पास आंदोलन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। कर्मचारी अब इस टेंडर को टालने के बजाय पूरी तरह रद्द कराने की मांग पर अड़े हुए हैं।

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