पटना, 16 सितंबर (पीबीएनएस): भारतीय राजनीति में आरक्षण हमेशा से एक संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। हाल ही में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के प्रति एक जोरदार समर्थन जताते हुए यह साफ किया गया कि जब तक उनकी सरकार सत्ता में है, आरक्षण को कोई छू नहीं सकता है। आरक्षण को लेकर विपक्ष के नेताओं पर निशाना साधते हुए यह भी कहा गया कि कांग्रेस पार्टी और विशेष रूप से राहुल गांधी ने कई बार आरक्षण का विरोध किया है।
राहुल गांधी पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने विदेश में जाकर देश की नीतियों के खिलाफ बातें कीं और यह तक कहा कि आरक्षण समाप्त किया जाना चाहिए। यहां तक कि उनके पूर्वजों पर भी आरोप लगाए गए कि उन्होंने आरक्षण के खिलाफ काम किया था। राहुल गांधी के परदादा, जवाहरलाल नेहरू ने आरक्षण का विरोध किया था और तत्कालीन मुख्यमंत्रियों को इस बारे में निर्देश भी दिए थे। वहीं, उनकी दादी, इंदिरा गांधी ने भी गरीबों, पिछड़ों और दलितों को आरक्षण न मिलने देने की कोशिश की थी।
मंडल कमीशन के दौरान भी कांग्रेस पार्टी के विरोध को याद किया गया, जब राजीव गांधी ने आरक्षण का समर्थन करने के बजाय इसका विरोध किया था। उस समय भी गांधी परिवार ने आरक्षण के खिलाफ खड़े होने का काम किया था। लेकिन, जब बी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बने और मंडल कमीशन को लागू किया, तब भारतीय जनता पार्टी ने आरक्षण के पक्ष में समर्थन दिया। इसके बाद आरक्षण को संविधान में मजबूती से स्थापित किया गया।
आज की कांग्रेस पार्टी पर आरोप है कि वह माइनॉरिटी यूनिवर्सिटी और राज्यों में माइनॉरिटी को आरक्षण देने की कोशिश करती है, जो कि संवैधानिक तौर पर सही नहीं है। लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार के दौरान आरक्षण के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। राहुल गांधी के ताजा बयानों के बाद, यह कहा जा रहा है कि कांग्रेस और उनके सहयोगी दल आरक्षण के विरोध में खड़े हैं और इसका फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं।
स्वामी विवेकानंद के अमेरिका दौरे और उनके द्वारा भारत के ज्ञान और संस्कृति का प्रचार करने का उदाहरण देते हुए, राहुल गांधी की विदेश यात्रा की तुलना की गई, जहां उन्हें देश के हितों के खिलाफ खड़े होने का आरोप लगाया गया। राहुल गांधी पर यह भी आरोप है कि वह भारत को तोड़ने वाली ताकतों के साथ खड़े हैं और आरक्षण का विरोध कर रहे हैं।


