गरजोया ने 2019 के ट्रांसजेंडर एक्ट का हवाला देते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की बात कही है, जबकि अस्पताल प्रशासन ने इस मामले पर चुप्पी साध ली है। जालंधर के बस्ती शेख की रहने वाली गरजोया ने बताया कि उन्होंने करीब दो महीने पहले इस अस्पताल में नौकरी के लिए आवेदन किया था। गरजोया का आरोप है कि उस दौरान दीपक नाम के व्यक्ति ने उनका मोबाइल नंबर लिया और नौकरी दिलाने का आश्वासन दिया। लेकिन नौकरी देने के बजाय, वह व्यक्ति उन्हें गलत और आपत्तिजनक मैसेज भेजने लगा। इससे परेशान होकर गरजोया ने उस वक्त वहां काम करने से मना कर दिया था।
मैनेजमेंट बदलने के बाद फिर बुलाया गया
लेकिन कुछ समय बाद अस्पताल के प्रबंधन में बदलाव आया तो गरजोया को दोबारा नौकरी के सिलसिले में बुलाया गया। गरजोया के अनुसार, उन्हें हाउसकीपिंग इंचार्ज ने आज दस्तावेजों के साथ बुलाया था। शुरुआती बातचीत में उन्हें वॉशरूम क्लीनिंग के काम के लिए कहा गया, जिसे उन्होंने स्वीकार भी कर लिया। गरजोया का कहना है कि वह समाज में सम्मान से जीने के लिए कोई भी छोटा-बड़ा काम करने को तैयार थीं।
‘किन्नर यहां काम नहीं कर सकते’
गरजोया ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जब वह काम जॉइन करने पहुंचीं तो अस्पताल के स्टाफ ने उन्हें यह कहकर बाहर निकाल दिया कि यहां वैकेंसी नहीं है। गरजोया का दावा है कि उन्हें स्पष्ट रूप से कहा गया कि अस्पताल के नियमों या माहौल के अनुसार किन्नर यहां काम नहीं कर सकते। उन्होंने इसे सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन और पहचान के आधार पर भेदभाव बताया है।
12वीं कक्षा तक शिक्षित गरजोया ने अधिनियम, 2019 का हवाला देते हुए कहा कि कानून उन्हें किसी भी संस्थान में सम्मानपूर्वक नौकरी करने का अधिकार देता है। उन्होंने समाज की दोहरी मानसिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर हम सड़कों पर भीख मांगते हैं, तो लोग हमसे नफरत करते हैं और विरोध करते हैं। लेकिन जब हम अपनी योग्यता के बल पर सम्मान की रोटी कमाना चाहते हैं, तो हमें नौकरियों से बाहर धकेल दिया जाता है।
पुलिस कार्रवाई की दी चेतावनी
पीड़ित गरजोया का कहना है कि उनके साथ यह दूसरी बार हुआ है, इसलिए वह अब चुप नहीं बैठेंगी और मामले की शिकायत पुलिस प्रशासन से करेंगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अस्पताल का निचला स्टाफ अपनी मनमानी करता है और उच्च अधिकारियों तक पूरी और सही बात नहीं पहुंचने देता।
