क्यों खास है शीतला अष्टमी? माता शीतला की पूजा से मिलता है स्वास्थ्य का आशीर्वाद

शीतला माता हिंदू धर्म में आरोग्य और रोग-निवारण की देवी हैं 11 मार्च 2026 को शीतला अष्टमी है और इस दिन रोग और शोक के मुक्ति पाने के लिए माता शीतला को बासी भोजन चढ़ाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि माता शीतला असल में हैं कौन और इन्हें बासी भोजन ही क्यों चढ़ाया जाता है?

सिद्ध मां बगलामुखी धाम के संस्थापक एवं व्यवस्थापक नवजीत भारद्वाज जी ने अखंड केसरी के धार्मिक डेस्क से विशेष बातचीत में बताया कि

हिन्दू धर्म में शीतला माता रोगों से रक्षा करने वाली देवी मानी जाती हैं, विशेष रूप से चेचक, खसरा और मौसमी संक्रमणों से रक्षा करने वाली देवी। इन्हें समर्पित शीतला अष्टमी या बसौड़ा मनाया जाता है, जो होली के आठ दिनों बाद चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर रखा जाता है। इस साल 11 मार्च 2026 को शीतला अष्टमी है। इस दिन देवी शीतला की पूजा के लिए सबसे शुभ मुहूर्त प्रात:काल 06:36 बजे से लेकर सायंकाल 06:27 बजे तक रहेगा। इस दिन लोग माता शीतला की कृपा पाने के लिए उन्हें बासी या ठंडा भोजन चढ़ाते हैं और स्वयं भी वही भोजन ग्रहण करते हैं।

नवजीत भारद्वाज जी ने बताया कि माता शीतला के नाम का अर्थ है ठंडी या शीतल करने वाली। कुछ लोग शताक्षी देवी को भी शीतला देवी कह कर संबोधित करते हैं। स्कन्द पुराण में माता शीतला का वाहन गधा बताया गया है, जो विनम्रता और साधारण जीवन का प्रतीक है। उनके हाथों में झाड़ू, सूप, नीम की पत्तियाँ, कलश और कभी-कभी अनाज या जल का पात्र होता है। पुराणों के अनुसार, माता शीतला मुख्य रूप से चेचक जैसे कई रोगों की देवी मानी गयी हैं। उनके हाथ में मौजूद कई चीजों का गहरा प्रतीकात्मक महत्व है। जब चेचक का रोगी जलन या कष्ट में वस्त्र उतार देता है, तो सूप से रोगी को हवा की जाती है और झाडू से चेचक के फोड़े फट जाते हैं।

वहीं औषधीय गुण होने के कारण नीम के पत्ते चेचक के फफोलों को सड़ने नहीं देते। इस रोग में रोगी को शीतलता चाहिए होती है, इसलिए उसे ठंडा जल प्रिय होता है। इसलिए, माता के हाथों में मौजूद कलश का भी महत्व है। माता के कलश में दाल के दानों के रूप में विषाणु या शीतल स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगाणु नाशक जल होता है। कहते हैं गधे की लीद के लेपन से चेचक के दाग मिट जाते हैं। इसलिए, उन्हें गधे पर सवार दिखाया गया है। शीतला माता के संग ज्वरासुर, जो ज्वर का दैत्य है; ओलै चंडी बीबी, जो हैजे की देवी है; चौंसठ रोग, घेंटुकर्ण, जो त्वचा-रोग के देवता हैं एवं रक्तवती, जो रक्त संक्रमण की देवी हैं, उन्हें साथ में दिखाया जाता है।

माता शीतला को बासी भोजन पसंद है। इसलिए, शीतला अष्टमी के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता और एक दिन पहले बना भोजन ही ग्रहण किया जाता है। यह आत्मसंयम और अनुशासन का अभ्यास है। शीतला अष्टमी पूजा में नीम की पत्तियाँ और झाड़ू का प्रयोग होता है, जो स्वच्छता और औषधीय गुणों का प्रतीक है। शीतला अष्टमी हमें यह सिखाती है कि स्वच्छता, शीतलता और संयम जीवन में रोगों से बचाव और आध्यात्मिक शांति का आधार है। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, अनुशासन और कृतज्ञता का प्रतीक है।

माता शीतला से जुड़े मंत्र

स्कन्द पुराण में शीतलाष्टक स्तोत्र का वर्णन मिलता है, जिसकी रचना स्वयं भगवान शंकर ने की थी। शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा गान करता है, साथ ही उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित भी करता है। शास्त्रों में भगवती शीतला की वंदना के लिए यह मंत्र बताया गया है –

वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।।
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।
इस मंत्र में माता शीतला की वंदना करते हुए उन्हें स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है।

माता शीतला को बासी भोजन क्यों चढ़ाया जाता है?

माता शीतला को ठंडा और बासी भोजन, जैसे कि बासी भात, दही, गुड़, ठंडा दूध इत्यादि अर्पित किया जाता है और वही ग्रहण भी किया जाता है। यह भले ही एक धार्मिक प्रथा के रूप में दिखती है लेकिन सच्चाई यह है कि अभी बदलते मौसम में लोगों को संक्रमित रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए, बासी भोजन चढाने के पीछे वैज्ञानिक कारण यह बताया जाता है कि पहले समय में गर्मियों में ताज़ा भोजन जल्दी खराब हो जाता था। बासी भोजन खाने से शरीर को ठंडक मिलती थी और संक्रमण से भी बचाव होता था। तो, अगर शीतला अष्टमी का प्रतीकात्मक महत्व देखा जाए, तो माता शीतला की पूजा के माध्यम से लोग इस नियम का पालन करते थे।

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