जालंधर/रिंकू सैनी
मां बगलामुखी धाम गुलमोहर सिटी नज़दीक लमांपिंड चौंक जालंधर में मां बगलामुखी जी के निमित सामुहिक निशुल्क दिव्य हवन यज्ञ का आयोजन मदिंर परिसर में किया गया। सर्व प्रथम ब्राह्मणो द्वारा मुख्य यजमान रीटा शर्मा से विधिवत वैदिक रिती अनुसार पंचोपचार पूजन, षोडशोपचार पूजन,नवग्रह पूजन उपरांत सपरिवार हवन-यज्ञ में आहुतियां डलवाई गई।
सिद्ध माँ बगलामुखी धाम में दिव्य हवन के पावन अवसर पर वातावरण केवल यज्ञ की अग्नि से ही नहीं, बल्कि भक्ति की ऊष्मा से भी प्रज्वलित था। मंत्रों की गूंज, आहुति की सुगंध और श्रद्धा से भरे हृदय ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं देवत्व वहाँ उतर आया हो। इसी दिव्य क्षण में धाम के प्रेरक प्रवक्ता नवजीत भारद्वाज जी ने एक ऐसा प्रसंग सुनाया, जो केवल इतिहास नहीं—हमारे जीवन का दर्पण है, हमारी आस्था की कसौटी है।
उन्होंने कहा, कौरव सभा में जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब अधर्म अपनी पराकाष्ठा पर था। सभा में बैठे थे भीष्म, द्रोण जैसे महापुरुष लेकिन सब मौन थे। पांडव सिर झुकाए बैठे थे। द्रौपदी ने पुकारा, पहले अपने पतियों को, फिर गुरुओं को, फिर पूरी सभा को पर कहीं से कोई उत्तर नहीं आया और जब हर सहारा टूट गया। जब आशा की अंतिम किरण भी बुझ गई। तब द्रौपदी ने दोनों हाथ उठाकर पुकारा, ‘‘हे कृष्ण! अब केवल तुम ही मेरी रक्षा कर सकते हो।’’ और उसी क्षण भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी लाज बचाई।
लेकिन, प्रसंग यहीं समाप्त नहीं होता। नवजीत भारद्वाज जी आगे कहते हैं, द्रौपदी के हृदय में एक प्रश्न उठा, एक पीड़ा थी। उसने कहा, ‘‘हे माधव! आप देर से क्यों आए? अगर आप चाहते, तो कोई मेरी साड़ी को हाथ भी नहीं लगा सकता था।’’ और तब भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए और उन्होंने कहा द्रौपदी, मैं देर से नहीं आया, ‘‘मैं तो उसी क्षण आ गया था, जिस क्षण तूने मुझे पूर्ण रूप से पुकारा।’’ जब तू पहले अपने पतियों को पुकार रही थी। जब तू भीष्म और द्रोण से आशा कर रही थी। तब तेरी आशा मुझ पर नहीं, संसार पर थी। तूने एक हाथ से साड़ी पकड़ी थी और दूसरे से मुझे पुकार रही थी। वह आधा समर्पण था। लेकिन जिस क्षण तूने दोनों हाथ छोड़ दिए। जिस क्षण तूने स्वयं को पूर्णत: मुझे सौंप दिया। उसी क्षण मैं प्रकट हो गया।
नवजीत भारद्वाज जी ने इस प्रसंग का सार बताते हुए कहा, यही हमारे जीवन का सत्य है जब हम भी संकट में भगवान को याद करते हैं, लेकिन साथ-साथ दुनिया के सहारे भी ढूंढते हैं। एक हाथ भगवान पर और दूसरा अपने अहंकार, अपने प्रयास, अपने रिश्तों पर और फिर शिकायत करते हैं, ‘‘भगवान मेरी मदद क्यों नहीं कर रहे?’’
नवजीत भारद्वाज जी ने प्रवचन के अंत में माँ भक्तों को समझाते हुए कहा कि यदि जीवन में चमत्कार देखना है तो द्रौपदी की तरह समर्पण करना सीखिए। न कोई शंका, न कोई दूसरा सहारा। केवल एक ही पुकार करो ‘‘हे प्रभु! अब सब कुछ तुम्हारे हवाले’’। विश्वास रखिए जहाँ समर्पण पूरा होता है वहीं से चमत्कार शुरू होता है। इस अवसर भारी संख्या में भक्तजन मौजूद थे।
