नई दिल्ली, 17 अप्रैल — पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल के तहत इज़राइल और लेबनान के बीच 10 दिनों का संघर्ष-विराम लागू हो गया है, जिससे पूरे क्षेत्र में राहत और उम्मीद का माहौल देखने को मिला है। राजधानी बेरूत समेत कई इलाकों में लोगों ने इस अस्थायी शांति का स्वागत आतिशबाजी और जश्न के साथ किया, हालांकि कुछ स्थानों पर हर्ष फायरिंग की घटनाएं भी सामने आईं। यह संघर्ष-विराम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पहल पर संभव हुआ, जिन्होंने लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन और इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ हुई बातचीत को “बेहतरीन” बताते हुए कहा कि दोनों देशों ने शांति की दिशा में कदम बढ़ाने पर सहमति जताई है। यह निर्णय हाल ही में वाशिंगटन में दोनों देशों के राजदूतों के बीच दशकों बाद हुई सीधी बातचीत के बाद लिया गया, जिसे कूटनीतिक दृष्टि से ऐतिहासिक माना जा रहा है। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, इस संघर्ष-विराम का उद्देश्य दोनों देशों के बीच स्थायी सुरक्षा और शांति समझौते की दिशा में विश्वास निर्माण करना है। हालांकि, इस समझौते के बीच कई जटिलताएं भी सामने आ रही हैं—इज़राइल ने स्पष्ट किया है कि उसकी सेना दक्षिणी लेबनान में बनी रहेगी, जबकि लेबनान इज़राइली सेना की वापसी, कैदियों की रिहाई और विस्थापित नागरिकों की घर वापसी की मांग कर रहा है। इस पूरे घटनाक्रम में ईरान समर्थित संगठन हिज़्बुल्लाह को बातचीत से बाहर रखा गया है, जिसने इस समझौते को सिरे से खारिज करते हुए इसे अमेरिका और इज़राइल के पक्ष में झुका हुआ बताया है। हिज़्बुल्लाह के महासचिव नईम कासिम ने इसे संगठन को कमजोर करने की साजिश करार दिया है। गौरतलब है कि 2 मार्च से शुरू हुए इस संघर्ष में अब तक 2,100 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 10 लाख लोग अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं। ऐसे में यह 10 दिन का संघर्ष-विराम न केवल क्षेत्र में तत्काल राहत लाने का प्रयास है, बल्कि भविष्य में स्थायी शांति की दिशा में एक अहम परीक्षा भी माना जा रहा है।
